मेरा यकीन इस बात पर है कि कोई
किसी का धर्म नहीं बदल सकता. सिर्फ़ आपका रब्ब ही आपका मज़हब बदल सकता है, कोई
इंसान नहीं.
मैं वर्षों पाकिस्तानी जेल में रहा लेकिन आपकी कौम के बारे में लोग वहाँ ज़्यादा
बात नहीं करते थे. नमाज़ अदा करने की कोई मजबूरी नहीं थी. हाँ आप अपने मन से कुछ भी
पढ़ या कर सकते हैं - ये कोई गुनाह तो नहीं है.
वहाँ रहकर मैने इस्लाम के बारे में बहुत कुछ सीखा. जेल में रहते हुए एक बात मैने
जमकर की- पढ़ाई. अब तो मैं उर्दू भी पढ़ लेता हूँ. क़ुराने पाक भी पढ़ने का मौका
मिला.
मैने बाकायदा तिब्ब किया है, तालीम ली है. जैसे भारत में हक़ीम होते हैं जो बीमारीयों
वगैरह का उपचार करते हैं, कुछ वैसी ही तालीम.
अब अपने गाँव लौटकर मैं लोगों की छोटी-छोटी बीमारियों में उनकी मदद करने की कोशिश
भी कर रहा हूँ.
(पाकिस्तानी जेल में 35 साल तक क़ैद रहे भारत के नागरिक कश्मीर सिंह की अगली डायरी
आप बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर शनिवार से पढ़ सकते हैं. इस लेख पर अपनी राय हमें
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अजनबी मुझको इतना बता...
अपना-पराया
जेल में रहते हुए मेरे लिए अजनबी और अपनों की परिभाषा और इसके बीच का फ़र्क कुछ
धुँधला सा होने लगा था. ये मन वैसे भी बड़ा बाँवला होता है- अजनबी कब अपना सा लगने
लगे कभी-कभी ख़ुद इसे भी ख़बर नहीं होती. जेल में भी कुछ मुलाज़िमों से कभी-कभी
हँसी-मज़ाक होता था, एक दूसरे से दिल्लगी चलती रहती थी.
डायरी में आपसे अब तक कई कड़वी यादें बाँटी हैं मैने. पैरों पर पड़ी लोहे की बेड़ियाँ
के निशां, न दिखने वाले दिल के गहरे घाव, अपनों से बिछड़ने का ग़म, तन्हाई और उदासी
में बीतते दिन.
लेकिन आज मैं आपसे ग़म के नहीं कुछ हल्के फुल्के लम्हे बाँटना चाहता हूँ.
पाकिस्तानी जेल के बंद दायरे में अजनबियों के बीच रहते हुए भी ज़िंदगी के ऐसे फ़लसफ़े
सीखने को मिले जो बाहर की खुली हवा और अपनों के बीच रहते शायद न समझ पाता.
जेल में रहते हुए मेरे लिए अजनबी और अपनों की परिभाषा और इसके बीच का फ़र्क कुछ
धुँधला सा होने लगा था.
ख़ामोशी को आवाज़ देने की कोशिश
ये मन वैसे भी बड़ा बाँवला होता है. अजनबी कब अपना सा लगने लगे कभी-कभी ख़ुद इसे भी
ख़बर नहीं होती.
पाकिस्तान की जेल में यूँ तो ज़्यादातर समय तन्हा ही बीता- ठहरा हुआ सा तन्हाई भरा
जीवन, लेकिन इस ठहराव के बीच हवा के ताज़ा झोंके की तरह कई हल्के-फुल्के पल भी आए
वहाँ.
जेलर, अधिकारी, दूसरे मुलाज़िम..जेल में कई तरह के लोग होते हैं. कहने को तो सब
अजनबी पर 35 साल कोई कम समय नहीं होता. इतने लंबे अरसे में तो अजनबियों में भी
अपनापन आ जाता है.
जेल में रहते हुए धीरे-धीरे मैं समझने लगा था कि अफ़सरों से किस लहजे में बात करनी
चाहिए और उनमें से कई लोग भी मुझे समझने लगे थे. परदेसियों का ख़्याल रखते हैं वो.
वहाँ के जेल अधिकारियों को लेकर कई तरह की धारणाएँ होती हैं लोगों के मन में. पर
वापस आने के बाद मैं तो यही सोचता हूँ कि आख़िरकर वे भी अपना काम ही कर रहे होते
हैं, मजबूर होते हैं. किसी के दुश्मन तो वो भी नहीं होते.
कुछ मुलाज़िमों से कभी-कभी हँसी-मज़ाक होता, एक दूसरे से दिल्लगी चलती रहती थी.
पाकिस्तानी अधिकारी मुझसे अकसर मेरे वतन, परिवार की बातें पूछते, सवाल जबावों का
सिलसिला चलता.
और मैं यही कहता और सोचता कि क्या बताऊँ..मैं तो अपने बच्चों के बारे में भी कुछ नहीं
जानता...कहाँ है, कैसे हैं.
क्रिकेट का जुनून
जेल में क्रिकेट मैच
भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच की तो बात ही कुछ और होती है, जेल में भी कई मैच देखे
हैं.पाकिस्तानी जेल, भारतीय क़ैदी और उस पर भारत-पाक क्रिकेट मैच ....ऐसे में पक्ष
किसका लें? सवाल टेढ़ा है. जो खिलाड़ी बेहतर खेले, जो टीम बेहतर खेल रही हो, जो जीते
उसे दाद दी जाए- मेरा हमेशा सीधा-सपाट सा यही फ़लसफ़ा था.
जेल जाने से पहले भारत में जब था तो कोई बड़ा खिलाड़ी होना का दावा तो नहीं कर सकता
पर फ़ुटबॉल वगैरह खेलता था. क्रिकेट का शौकीन था. जेल की सलाखों के पीछे भी क्रिकेट
का ये शौक परवान चढ़ता रहा.
मुझे रात में भले ही रोटी खाने को न मिले पर रात भर क्रिकेट की कमेंट्री ज़रूर सुन
सकता था. मुझे बड़ा दिलचस्प लगता था ये सब.
भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच की तो बात ही कुछ और होती है, जेल में भी कई मैच देखे
हैं. सज़ा-ए-मौत वाले कई क़ैदियों के लिए टीवी सेट होते थे.
जब पता चलता था कि आज मैच है तो अधिकारियों से कुछ मोहलत ले लेते थे और वहीं मैच का
लुत्फ़ उठाते थे. अब कुछ अधिकारियों से इतना मेलमिलाप तो हो ही जाता था.
सोचिए जेल की चारदीवारी में चौकों-छक्कों का रोमांच... ऐसा लगता मानो बाउंडरी पार
करती गेंद के पीछे-पीछे हाँफता हुआ खिलाड़ी न हो बल्कि मैं भाग रहा हूँ, हवा में
उछलती गेंद के साथ ही कल्पना भी उड़ान भरने लगती.
मंज़र कुछ अजीब सा होता था-मैं भारतीय क़ैदी पाकिस्तानी जेल में भारत-पाक क्रिकेट
मैच देखता था....ऐसे में पक्ष किसका लें? सवाल टेढ़ा है.
पाकिस्तान अच्छा खेलता तो मैं उसकी तारीफ़ करता था और अगर भारत बाज़ी मार जाता तो
उसकी प्रशंसा होती थी.
जो खिलाड़ी बेहतर खेले, जो टीम बेहतर खेल रही हो, जो जीते उसे दाद दी जाए- मेरा
हमेशा सीधा-सपाट सा यही फ़लसफ़ा था.
जेल की चारदीवारी में कभी-कभार मिलने वाले इन हल्के फुल्के लम्हों की गर्माहट लिए
यूँ ही दिन कटते चले गए.
अहि कहानी कॆ पहिल भाग पढई लॆल साहित्य पॆज कॆ इन दिनॊ मॆ मौत कॆ कितनॆ पास आ गए
पढॆ!