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दरभंगा। इस समय जिला के पारंपरिक आस्था जुड़ी कमला नदी में अधिकांश जगहों पर पैदल पार करना भी आसान है, लेकिन वर्ष 2007 में आयी प्रलयंकारी बाढ़ की याद आते ही लोग कमला मैया से ही बचाने की गुहार करते हैं। कारण उस बार जिला की तीन चौथाई आबादी इसी की विनाशलीला की चपेट में आयी थी। रही सही कसर बागमती सहित अन्य नदियों ने भी पूरी कर दी थी। सरकारी घोषणा के अनुपालन का आलम यही है कि छह जगहों पर क्षतिग्रस्त कमला के तटबंध पर अभी तक एक टोकरी मिट्टी नहीं डाली जा सकी है। बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल झंझारपुर के कार्यपालक अभियंता ने जिलाधिकारी को लिखे पत्र में रोजगार गारंटी योजना से इसकी मरम्मती कराने तथा इसके लिये प्राक्क्लन भेजा है। घनश्यामपुर, किरतपुर, कुशेश्वरस्थान सहित आधा दर्जन प्रखंडों को तबाह कर देने वाली कमला नदी को परंपरा के अनुसार ही लोग रक्षा की गुहार लगा रहे हैं ताकि इस बार अपना उग्र रूप नहीं दिखाये। सवाल उठता है कि मानसून आने के चंद दिन शेष हैं और इस समय तक इसी पर मंथन जारी है कि इसकी मरम्मती कैसे हो? हालांकि सरकार ने जिला के 29 जमींदारी बांधों के जीर्णोद्धार के लिये 13 करोड़ रूपये की स्वीकृति प्रदान की है, लेकिन अब तक निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है। कहने के लिये तो 31 मई तक ही निर्माण कार्य पूर्ण होने की समय सीमा तय की गयी है। धरातल पर स्थिति कुछ और है। वहीं गत वर्ष करेह नदी पर भरी दबाव था। हालांकि समस्तीपुर जिला में कई जगहों पर इसके बांध के टूट जाने के कारण यहां राहत तो मिल गयी, लेकिन यदि वर्षापात की रफ्तार की पुनरावृत्ति हुयी तो यह भी आपदा लाने में पीछे नहीं रहेगी। बागमती, खिरोई व बुढ़नद ने भी पिछले साल विकराल रूप धारण कर जाले, केवटी व सिंहवाड़ा प्रखंड में तबाही मचायी थी। बचाव के लिये कोई प्रयास शुरू नहीं किये गये हैं। एक ओर से खुली बागमती नदी हनुमाननगर में समुद्र जैसी हालात पैदा कर देती है। कुल मिलाकर तटबंधों को फिलहाल भगवान भरोसे ही छोड़ा गया है और यदि यही स्थिति बनी रही तो प्रलय अवश्यंभावी है। हालांकि प्रशासनिक दावा कि समय से पहले बचाव कार्य कर लिया जायेगा।
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