पटना, (आईएएनएस)। 'कौन कहता
है कि आसमां में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो'। जी हां, इसी
तरह का पत्थर बिहार के बांका जिले के नूनेश्वर मरांडी ने उछाला और पहाड़ पर ही
बागीचा लगा दिया। बिहार के बांका जिला के चानन प्रखंड अन्तर्गत बाबूमहल गांव का रहने
वाला नूनेश्वर के पुरखों की कुछ जमीन वहीं के एक पहाड़ पर थी।
जहां घरवाले उस जमीन को अनुपयोगी मान चुके थे, वहीं स्थानीय लोगों को भी वह जमीन
किसी काम का प्रतीत नहीं हो रहा था। लेकिन नूनेश्वर उस जमीन का कायाकल्प करने का मन
बना चुका था। अपने सोच को जमीं पर उतारने के लिए उसने परिवार एवं अपने दोस्तों से
सलाह लिया पर आरंभ में सबने उसकी सोच को हंसी में उड़ा दिया, परंतु अपनी धुन का
पक्का नुनेश्वर ने उस बंजर जमीन पर मानो बहार ला दिया।
नूनेश्वर मरांडी ने जहां पहाड़ पर दो दर्जन दुधारू मवेशियों को साथ लेकर डेयरी का
काम आरंभ कर दिया, वहीं उसने पास में ही दो तालाब खोद लिए। एक में पानी जमाकर ड्रिप
विधि से पौधों की सिंचाई शुरू कर दी, वहीं दूसरे तालाब में मछली पालन का कार्य शुरू
कर दिया। नूनेश्वर ने इसके साथ खाली पड़ी जमीन पर आम-अमरूद का पेड़ लगाया एवं नींबू
और मिर्च की खेती आरंभ कर दी।
नूनेश्वर जो कल तक बेरोजगारी का दंश झेल रहा था आज प्रतिवर्ष लाखों रुपये कमा रहा
है। नूनेश्वर की इस उपलब्धि के लिए सरकार ने उसे सम्मानित भी किया है। जिला प्रशासन
ने उसे किसान भूषण सम्मान से सम्मानित किया।
नूनेश्वर बताते हैं कि आरंभ में पहाड़ सा लगने वाला यह कार्य उसकी पहचान बन चुकी
है। वह सरकार द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले सूचना एवं आधुनिक खेती के प्रशिक्षण के
लिए सरकार की प्रशंसा भी करता है। स्थानीय कृषि विभाग के अधिकारी नूनेश्वर के कायरें
की प्रशंसा करते नहीं थकते हैं। कृषि विभाग की संस्था बामेती के निदेशक डा.आर. के.
सोहाने बताते हैं कि नूनेश्वर के खेती की विधि काबिले तारीफ है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।